सावन माह की पौराणिक कथा: भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करना हिंदू धर्म की एक पवित्र परंपरा है, जिसका गहरा आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है। माना जाता है कि गंगाजल शिवजी के क्रोध को शांत करता है और मनोकामनाएँ पूर्ण करता है। यह अभिषेक नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने, आत्मिक शुद्धि पाने और पुण्य अर्जित करने का सरल माध्यम माना जाता है। इस लेख में जानिए इसके पीछे छिपे धार्मिक कारण और पौराणिक कथाओं से जुड़ी मान्यताएँ।

परिचय
हिन्दू पंचांग के अनुसार, सावन या श्रावण माह वर्ष का पांचवां महीना है। यह महीना खासतौर पर भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। बरसात के मौसम में पड़ने वाले इस महीने में भक्तगण भगवान शिव की पूजा-अर्चना बड़े उत्साह और श्रद्धा से करते हैं। सावन का महीना न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से बल्कि पौराणिक कथाओं के अनुसार भी बहुत महत्व रखता है।
सावन माह का भगवान शिव से गहरा रिश्ता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, इसी महीने में समुद्र मंथन की वह ऐतिहासिक घटना घटी थी, जिसमें देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए मिलकर समुद्र मंथन किया था।
समुद्र मंथन की कथा
बहुत समय पहले जब देवताओं और असुरों के बीच बार-बार युद्ध होने लगे, तो देवताओं की शक्ति कमजोर हो गई। भगवान विष्णु के कहने पर दोनों पक्षों ने साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का निश्चय किया, ताकि अमृत प्राप्त किया जा सके।
मंथन के दौरान समुद्र से 14 अनमोल वस्तुएं (रत्न) निकलीं। इनमें से अंतिम वस्तु थी – एक भयंकर और ज़हरीला विष, जिसे “हलाहल” कहा गया। यह विष इतना तेज था कि उसकी ज्वाला से पूरा संसार संकट में आ गया। न तो कोई देवता और न कोई असुर उसे छू सकता था, सब घबरा गए।
भगवान शिव ने विष क्यों पिया?
अंतिम उपाय के तौर पर सभी देवता और ऋषि-मुनि भगवान शिव के पास पहुंचे और उनसे संसार को बचाने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने अपनी करुणाभावना और दयालुता के कारण, उस विष का पान करने का निश्चय किया, ताकि सृष्टि बच सके। शिव जी ने सारा विष पीकर उसे अपने कंठ में रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया। इसीलिए उन्हें “नीलकंठ” भी कहा जाता है।
गर्मी शांत करने के लिए गंगाजल
हलाहल विष के प्रभाव से शिवजी के शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न हो गई। तब सभी देवताओं ने गंगा जल लाकर शिव जी के ऊपर चढ़ाया, जिससे उनकी तकलीफ कम हुई। यह घटना श्रावण माह में ही घटी मानी जाती है।
क्यों सावन में शिवजी का जलाभिषेक होता है?
इसलिए परंपरा बन गई कि श्रावण मास में भगवान शिव को जल जरूर चढ़ाना चाहिए। मान्यता है कि इस माह में यदि कोई भक्त शिवलिंग पर जल या गंगाजल चढ़ाता है, तो भगवान शिव विशेष कृपा करते हैं। सावन सोमवार के व्रत, शिव मंदिरों में खास पूजा और कांवड़ यात्रा इसी वजह से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कांवड़ यात्रा और उसकी महिमा
सावन में लाखों श्रद्धालु गंगाजल लेने के लिए अलग-अलग जगहों से पैदल यात्रा पर निकलते हैं। वे “कांवड़” में गंगाजल भरकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। यह यात्रा ‘कांवड़ यात्रा’ कहलाती है, जो उत्तर भारत सहित देश के कई हिस्सों में बेहद लोकप्रिय है।
सोमवार का व्रत और पूजा का महत्व
सावन महीने में हर सोमवार को व्रत रखने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे मन की इच्छाएं पूरी होती हैं। भक्त शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, व्रत रखते हैं, विशेष पूजा-पाठ करते हैं और कथा सुनते हैं।
शिव-पार्वती का विवाह और पार्वती माँ की तपस्या
एक दूसरी प्रसिद्ध कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए इसी पवित्र महीने में कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति और कठिन साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पार्वती जी से विवाह किया। ऐसे में सावन माह को विवाहित जीवन की सुख-शांति एवं शिव-पार्वती के प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है।
अन्य धार्मिक आस्था और परंपराएं
- सावन भर माता पार्वती और भगवान शिव की कथा सुनना शुभ माना जाता है।
- इस पूरे मास में खानपान और आचरण में संयम रखने, सात्विक भोजन करने, भक्ति-भजन और जप-तप करने की परंपरा है।
- शिव भक्त कहते हैं कि जो भी श्रद्धा भाव से इस मास में पूजा करता है, भगवान शिव उसकी हर मनोकामना पूरी करते हैं।
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सारांश (Brevity, not redundant)
संक्षेप में, सावन माह हिंदू धर्म में शिव-भक्ति, प्राकृतिक पवित्रता और धार्मिक आस्था का प्रतीक है। इसका संबंध न केवल धार्मिक कथाओं से है बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में भी इसकी गहरी छाप है। यही कारण है कि हजारों सालों से यह महीना भगवान शिव के प्रति समर्पण और आराधना का समृद्ध समय माना जाता है।
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